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ओ अभागी आत्मा के प्यार

छोड़ आए एक अनजानी गली में,
फूल में भँवरे में उपवन में कली में
ओ अभागी आत्मा के प्यार ,
तुम क्यों लौट आये।
फिर हुआ है मन बहुत लाचार,
तुम क्यों लौट आये।

पलक पर आंसू अभी सूखे नही थे,
उँगलियाँ भूली नहीं कोमल छुवन को।
देवता नैवेद्य पाकर तृप्त हैं सब,
और तुम प्रस्तुत खड़े फिर से हवन को,
कँपकँपाती श्वांस में घायल अधर से,
फिर न हो पायेगा मंत्रोच्चार,
तुम क्यों लौट आये।

बस अभी कुछ देर पहले चोट खाकर,
हम गिरे थे आज भी सम्हले नहीं है,
कल अभी जिनपर हुए थे पांव घायल,
प्यार के वे पथ अभी बदले नहीं है।
हांफती पतवार उफनाये भँवर से,
फिर न हो पाएगी नैया पार,
तुम क्यों लौट आये।

तार वीणा के सभी उलझे हुए हैं,
चाहते हो तुम अभी संगीत सुनना,
हार बैठा है जो सारे दांव तुम पर,
तुम उसी से चाहते हो जीत चुनना।
लरजते दो होंठ दुखती उंगलियों से,
फिर न हो पायेगा अब श्रृंगार,
तुम क्यों लौट आये।

प्रियान्शु गजेन्द्र

sourace : http://priyanshugajendra.blogspot.com/

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